अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना का संस्कृत प्रेम

abdurrahim khan

शंभूनाथ शुक्ल

मुगल काल में अकबर सबसे महान सम्राट था। उसके दरबार में काबिल और विद्वान लोगों का जमावड़ा था। ऐसे ही एक विद्वान थे अब्दुर्रहीम खाँ साहब जिन्हें अकबर ने अपने नौरत्नों में जगह दी थी। इन रहीम साहब के पिता बैराम खाँ ने अकबर को पाला-पोषा था क्योंकि अकबर के पिता हुमायूं का तो अल्प उम्र में ही निधन हो गया था। इसलिए मात्र तेरह साल की उम्र में अकबर को बादशाह की गद्दी मिली। अकबर की सारी पढ़ाई-लिखाई किसी मदरसे में नहीं बल्कि युद्घ के मैदान में हुई। हुमायूं एक कमजोर शासक था और शत्रुओं ने हिंदुस्तान के बादशाह को चारों तरफ से घेर रखा था। पश्चिम से मध्यएशिया और काबुल के सुल्तान अकबर को पछियाये थे तो पूरब से सासाराम का अफगान शासक शेरशाह सूरी। इसके अलावा शेरशाह सूरी के बेटे ने तो कहर मचा रखा था। उसके एक सेनापति हेमचंद्र विक्रमादित्य जिसे हेमू के नाम से याद किया जाता है, ने तो दिल्ली के तख्त पर कब्जा ही कर लिया था। ऐसे समय में अकबर और उनके पालक बैराम खां ने अच्छे लोगों का चयन किया। उन योद्घाओं ने अकबर को विजय दिलाई। बाद में जब बैराम खाँ की महत्त्वाकांक्षाएं बढऩे लगीं तो अकबर ने उसे काबुल भेज दिया जहां पर रास्ते में कुछ शत्रुओं ने उसको मार डाला। अकबर ने बैराम खाँ के बेटे को अपने यहां शरण दी और उसे उच्च शिक्षा दिलाई। यही अब्दुर्रहीम खाँ थे। इनकी वीरता, बहादुरी और विद्वता पर मुग्ध होकर अकबर ने इन्हें खान-ए-खाना की उपाधि दी। रहीम न सिर्फ अरबी-फारसी अथवा उस वक्त दिल्ली में बोली जाने वाली ब्रज भाषा के विद्वान थे बल्कि अवधी व भोजपुरी में भी उन्होंने कवित्त लिखे हैं। खासकर संस्कृत में लिखी उनकी कविताएं तो आजतक याद की जाती हैं। अकबर ने संस्कृत और फारसी को मिलाकर मदनाष्टक लिखा है।

उनकी संस्कृत की कविताएं यूं हैं-

आनीता नटवन्मथया तब पुर; श्रीकृष्णँ! या भूमिका ।

व्योामाकाशखखांबराब्धिवसवस्व् मेत्प्रीसतयेऽद्यावधि ।।

प्रीतस्वंन्म यदि चेन्निरीक्ष्यक भगवन् स्वीप्रार्थित देहि मे ।

नोचेद् ब्रूहि कदापि मानय पुरस्वेन तादृशीं भूमिकाम् ।।

(हे श्रीकृष्णा! आज तक मैं नट की चाल पर आपके सामने लाया जाने से चैरासी लाख रूप धारण करता रहा । हे परमेश्वशर! यदि आप इसे देख कर प्रसन्न हुए हों तो जो मैं माँगता हूँ उसे दीजिए और नहीं प्रसन्न‍ हों तो ऐसी आज्ञा दीजिए कि मैं फिर कभी ऐसे स्वाँग धारण कर इस पृथ्वी पर न लाया जाऊँ।)

—————– 2 ———————–

रत्नांकरोऽस्ति सदनं गृहिणी च पद्मा,

किं देयमस्ति भवते जगदीश्वनराय ।

राधागृहीतमनसे मनसे च तुभ्यं ,

दत्तंृ मया निजमनस्त दिदं गृहाण ।।

(रत्नाकर अर्थात् समुद्र आपका गृह है और लक्ष्मी जी आपकी गृहिणी हैं, तब हे जगदीश्वर! आप ही बतलाइए कि आप को क्या देने योग्य बच गया? राधिका जी ने आप का मन हरण कर लिया है, जिसे मैं आपको देता हूँ, उसे ग्रहण कीजिए।)

——————– 3 ——————————-

अहल्या् पाषाणःप्रकृतियशुरासीत् कपिचमू –

र्गुहो भूच्चां डा‍लस्त्रितयमपि नीतं निजपदम् ।।

अहं चित्ते्नाश्माा पशुरपि तवार्चादिकरणे ।

क्रियाभिश्चांंडालो रघुवर नमामुद्धरसि किम् ।।

(अहिल्या पत्थर थीं, बंदरों का समूह पशु था और निषाद चांडाल था पर तीनों को आप ने अपने पद में शरण दी । मेरा चित्त पत्थर है, आपके पूजन में पशु समान हूँ और कर्म से भी चांडाल सा हूँ इसलिए मेरा क्यों नहीं उद्धार करते।)

—————————- 4 —————————————

यद्यात्रया व्‍यापकता हता ते भिदैकता वाक्परता च स्‍तुत्‍या ।

ध्‍यामेन बुद्धे; परत; परेशं जात्‍याऽजता क्षन्‍तुमिहार्हसि त्‍वं ।।

(यात्रा करके मैंने आपकी व्यापकता, भेद से एकता, स्‍तुति करके वाक्परता, ध्‍यान करके आपका बुद्धि से दूर होना और जाति निश्चित करके आपका अजातिपन नाश किया है, सो हे परमेश्‍वर! आप इन अपराधों को क्षमा करो।)

अब जरा रहीम के उन कविताओं को पढ़ें जिनमें संस्कृत व फारसी का बराबर इस्तेमाल किया गया है।

दृष्‍टा तत्र विचित्रिता तरुलता, मैं था गया बाग में ।

काचितत्र कुरंगशावनयना, गुल तोड़ती थी खड़ी ।।

उन्‍मद्भ्रूधनुषा कटाक्षविशि;, घायल किया था मुझे ।

तत्‍सीदामि सदैव मोहजलधौ, हे दिल गुजारो शुकर ।।

(विचित्र वृक्षलता को देखने के लिए मैं बाग में गया था । वहाँ कोई मृग-शावक-नयनी खड़ी फूल तोड़ रही थी । भौं रूपी धनुष से कटाक्ष रूपी बाण चलाकर उसने मुझे घायल किया था। तब मैं सदा के लिए मोह रूपी समुद्र में पड़ गया। इससे हे हृदय, धन्‍यवाद दो।)

एकस्मिन्दिवसावसानसमये, मैं था गया बाग में ।

काचितत्र कुरंगबालनयना, गुल तोड़ती थी खड़ी ।।

तां दृष्‍ट्वा नवयौवनांशशिमुखीं, मैं मोह में जा पड़ा ।

नो जीवामि त्‍वया विना श्रृणु प्रिये, तू यार कैसे मिले ।।

(एक दिन संध्‍या के समय मैं बाग में गया था। वहाँ कोई मृगछौने के नेत्रों के सामान आँख वाली खड़ी फूल तोड़ती थी । उस चन्‍द्रमुखी युवती को देखकर मैं मोह में जा पड़ा। हे प्रिये! सुनो, तुम्‍हारे बिना मैं नहीं जी सकता (इसलिए बताओ) कि तुम कैसे मिलोगी ?)

अच्‍युतच्‍चरणातरंगिणि शशिशेखर-मौलि-मालतीमाले ।

मम तनु-वितरण-समये हरता देया न में हरिता ।।

(विष्‍णु भगवान के चरणों से प्रवाहित होने वाली और महादेव जी के मस्‍तक पर मालती माला के समान शोभित होनेवाली हे गंगे, मुझे तारने के समय महादेव बनाना न कि विष्‍णु । अर्थात् तब मैं तुम्‍हें शिर पर धारण कर सकूँगा।)

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