कोर्ट में जजों की सुनवाई!

spशंभूनाथ शुक्ल

निश्चय ही सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा प्रेस को बुलाकर ब्रीफ करना न्यायपालिका के इतिहास में शुभ नहीं रहा. जिन चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस की, उन्होंने कहा कि उन लोगों ने दो महीने पहले ही मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र को एक पत्र भेज कर हालत से वाकिफ करवा दिया था कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ सही नहीं चल रहा है, और जिस तरह से रोस्टर सिस्टम में मनमानी की जा रही है, उसका असर दूर तक जाएगा. जजों का कहना है कि पर जस्टिस दीपक मिश्र ने उस पत्र का न तो जवाब दिया और न ही कोई कार्रवाई की, ऐसी स्थिति में वे कब तक अपने मन को मान कर चुप बैठे रहते. इसलिए वे प्रेस के समक्ष आए हैं ताकि जनता को कोर्ट की हकीकत बता सकें. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जजों ने इतना बड़ा कदम शायद पहली बार उठाया है. इससे यह संकेत तो मिलता ही है कि देश की सर्वोच्च अदालत में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

किताबों से दूर होता समाज

अब इन जजों ने जनता की अदालत में आकर अपनी बात कही, यह सही अथवा गलत यह अलग मुद्दा है लेकिन अन मुख्य नायाधीश को जवाब तो देना ही होगा. आखिर क्यों वे सभी जजों को सामान नज़र से नहीं देखते और मुकदमों को उनकी गंभीरता के लिहाज़ से नहीं देखते और जजों की वरिष्ठता तथा कनिष्ठता के लिहाज़ से उन्हें नहीं सौंपते. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र ने संविधान पीठ बनाने के मामले में पहले से निर्धारित रोस्टर प्रणाली में बदलाव किया है. मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट में सभी जज समान होते हैं. मुख्य न्ययाधीश को बस यह अधिकार है कि वह पीठ तय करे. इसमें भी नए जजों को हलके मामले दिए जाते हैं और पुराने जजों को थोडा सीरियस मैटर. किन्तु जस्टिस दीपक मिश्र ने यहाँ अपनी मर्ज़ी से पीठ बनाई और कई सीरियस मैटर नए जजों के पास भेजे. इससे वरिष्ठ जज जे. चलमेश्वर, रंजन गोगोई, कूरियन जोसेफ और मदन लोकुर ने ऐतराज़ किया तथा इस बाबत उन्हें चिट्ठी लिखी. जब कोई जवाब नहीं आया तो वे मीडिया के पास गए.हालाँकि यह कहा जा सकता है कि जजों ने जल्दबाजी की और इस मामले में दूसरे तरीके अपनाए जा सकते थे पर शायद इन न्यायमूर्तियों को यही तरीका बेहतर लगा. इन चार जजो ने मिलकर जो चिठ्ठी लिखी हैं उस से यह सिद्ध होता है कि यह एक दो मामलों की बात नही है मूल विषय जजो के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करने का है इस से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर ही संदेह उत्पन्न हो रहा है, सरल शब्दों में कहा जाए तो इन चार जजो का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश ‘समकक्षों में प्रथम’  हैं और इस कारण उन्हें अपने मन से फैसले करने का अधिकार नही हैं

सच लिखने-बोलने पर पाबंदी

चीफ जस्टिस को भेजी चिट्ठी में चारो जज लिखते है कि सिद्धांत यही है कि चीफ जस्टिस के पास रोस्टर बनाने का अधिकार है. वह तय करते हैं कि कौन सा केस इस कोर्ट में कौन देखेगा. यह विशेषाधिकार इसलिए है,  ताकि सुप्रीम कोर्ट का कामकाज सुचारू रूप से चल सके. लेकिन इससे चीफ जस्टिस को उनके साथी जजों पर कानूनी,  तथ्यात्मक और उच्चाधिकार नहीं मिल जाता. चिट्ठी में कहा गया है कि ऐसे भी कई मामले हैं, जिनका देश के लिए खासा महत्व है. लेकिन, चीफ जस्टिस ने उन मामलों को तार्किक आधार पर देने की बजाय अपनी पसंद वाली बेंचों को सौंप दिया.चीफ जस्टिस को भेजी चिट्ठी में चारो जज लिखते है कि सिद्धांत यही है कि चीफ जस्टिस के पास रोस्टर बनाने का अधिकार है. वह तय करते हैं कि कौन सा केस इस कोर्ट में कौन देखेगा. यह विशेषाधिकार इसलिए है,  ताकि सुप्रीम कोर्ट का कामकाज सुचारू रूप से चल सके. लेकिन इससे चीफ जस्टिस को उनके साथी जजों पर कानूनी,  तथ्यात्मक और उच्चाधिकार नहीं मिल जाता. चिट्ठी में कहा गया है कि ऐसे भी कई मामले हैं, जिनका देश के लिए खासा महत्व है. लेकिन, चीफ जस्टिस ने उन मामलों को तार्किक आधार पर देने की बजाय अपनी पसंद वाली बेंचों को सौंप दिया.

अब मोदी के नाम से हिलोर नहीं उठती

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया देश की एकमात्र ऐसी सरकारी संस्था है, जो वैधता के बजाए प्राथमिकता और नैतिकता के आधार पर कार्य करती है. लेकिन पिछले कुछ अरसे से सुप्रीम कोर्ट में इसके उलट वैधता पर ज्यादा जोर है. यह प्राथमिकता और नैतिकता से पलायन की पराकाष्ठा ही है, जो सुप्रीम कोर्ट के चार जजों को प्रेस कॉन्फ्रेंस का सहारा लेना पड़ा. भारत के सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब सिटिंग जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की है. हमें अभी इस बात की गंभीरता का एहसास नहीं है, लेकिन यह पल हमारे संवैधानिक इतिहास के निम्नतम बिंदु के तौर पर गिना जाएगा. वह संवैधानिक इतिहास, जिसे हम में से ज्यादातर कानून के शिक्षार्थी गर्व और श्रद्धा की भावना के साथ पढ़ते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसे पल दो बार पहले भी आ चुके हैं. पहला तब, जब तीन जजों की वरिष्ठता की अनदेखी करते हुए जस्टिस रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था और दूसरा तब, जब जस्टिस एचआर खन्ना की जगह जस्टिस बेग को तरजीह देते हुए नियुक्त किया गया था.

पाकिस्तान से सीखें विनय कटियार

हमें अभी इस बात की गंभीरता का एहसास नहीं है, लेकिन यह पल हमारे संवैधानिक इतिहास के निम्नतम बिंदु के तौर पर गिना जाएगा. वह संवैधानिक इतिहास, जिसे हम में से ज्यादातर कानून के शिक्षार्थी गर्व और श्रद्धा की भावना के साथ पढ़ते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसे पल दो बार पहले भी आ चुके हैं. पहला तब, जब तीन जजों की वरिष्ठता की अनदेखी करते हुए जस्टिस रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था और दूसरा तब, जब जस्टिस एचआर खन्ना की जगह जस्टिस बेग को तरजीह देते हुए नियुक्त किया गया था.जजों के बीच विवाद और मतभेद उस समय भी खासे गहरा गए थे, लेकिन मौजूदा वक्त की तरह तब, कोर्ट की शुचिता पर संकट खड़ा नहीं हुआ था. क्योंकि उस समय इन घटनाओं के कर्ताधर्ता इंदिरा गांधी के मातहत काम करते थे और उन्हीं के निर्देशों द्वारा संचालित होते थे. दरअसल मौजूदा संकट ने सुप्रीम कोर्ट की जन्मजात समस्या को जाहिर किया है. सुप्रीम कोर्ट में कोई चीज ऐसी है जो सड़ चुकी है.

राहुल गाँधी की अय्यर को सीख!

अलग-अलग बेंचों को केसों के आवंटन को लेकर निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट में समस्याएं और जटिलताएं बढ़ी हैं. उदाहरण के तौर पर जस्टिस ए. एम. खानविलकर का मामला ही लीजिए. जस्टिस खानविलकर दरअसल कामिनी जायसवाल बनाम भारत सरकार केस की सुनवाई करने वाली बेंच में शामिल थे. इसके अलावा, वह खासे विवादित मेडिकल कॉलेज केस की सुनवाई करने वाली बेंच में भी शामिल थे. इस केस को कामिनी जायसवाल के केस के साथ ही चलाया जा रहा था. लेकिन जब विवाद गर्माया तो, जस्टिस खानविलकर ने इस मामले में खुद को क्लीन चिट दे दी.  अब राजनीति तो रही है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. क्योंकि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र खुद एक मामले में आरोपी हैं और वह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में है. कहते हैं उसे मुख्य न्यायाधीश ने नए जजों को सौंपा था. यह भी आरोप कि जस्टिस दीपक मिश्र इसी वज़ह से सरकार के मामलों की जांच में भी ढिलाई बरतते हैं.

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