बहुओं ने खारिज की ‘लोटा’ पार्टी!

lota partyशंभूनाथ शुक्ल

पूरालाल ढेमा, तहसील बदलापुर, जिला जौनपुर एक सामान्य गाँव नहीं है। यह वह गाँव है, जहाँ की बहुएँ ग्रेजुएट हैं और ज्यादातर ने बी।एड और टीईटी का कोर्स कर रखा है। इन बहुओं का ही कौशल है कि इस पूरे गाँव में कोई लड़की ऐसी नहीं मिली जो स्कूल न जाती हो। और कोई घर ऐसा नहीं मिला जहाँ औरतें ‘लोटा’ पार्टी जमात की हों। यानी सुबह अँधियारे में ही लोटा लेकर उन्हें खेतों की तरफ जाना पड़ता हो। हर दूसरे-तीसरे घर में टॉयलेट्स बनी हैं। पक्की और दरवाज़े वाली। कुछ ने घर के भीतर बनवा रखी है तो कुछ ने घर के बाहर कोने पर। कुछ घर तो ऐसे भी दिखे, जहाँ टॉयलेट्स और बाथरूम कमरे से अटैच्ड हैं। यह कमाल किया बहुओं ने गाँव की लड़कियों ने और उनके इस अभियान को गति दी चंचल कुमार ने। चंचल कुमार ने अपने बूते गाँव में एक पाठशाला खोली, जिसका नाम दिया समता घर। गाँव के लड़के व लड़कियों को नाममात्र की फीस पर इस समताघर में आने को प्रेरित किया। यहाँ न सिर्फ उनकी पढ़ाई की व्यवस्था की बल्कि कढ़ाई का भी मुक़म्मल इंतज़ाम किया। पढ़ाई के साथ-साथ हस्त-शिल्प का कौशल भी। नतीजा यह निकला कि यहाँ से पढ़े युवाओं को गाँव में ही काम की कमी नहीं।

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यह सच है कि गाँव में अब बिजली पर्याप्त मिलती है। दिन भर में करीब 18 घंटे, इस कारण इस गाँव में फ्रिज, एसी, कूलर, टीवी आदि की कमी नहीं है। और इस वज़ह से गाँव को इन उपकरणों की देखभाल के लिए इलेक्ट्रिशियन चाहिए और ये सब समताघर से मिल जाते हैं। अपने सहारे गाँव यानी स्वावलंबन की पक्की बानगी है यह गाँव। लेकिन जो सबसे खास बात यहाँ देखने को मिली, वह है यहाँ की लड़कियों का पढ़ाई के प्रति अत्यधिक रुझान। इस गैर परम्परागत स्कूल में भी पढ़ने के लिए करीब दो सौ बच्चे आते हैं, इसमें से लड़के कुल 50 और लड़कियाँ डेढ़ सौ। सारे बच्चे छ्ठी से दसवीं क्लास के हैं। पर मज़े की बात यह कि जहाँ लड़कों ने अंग्रेजी और गणित से दूरी जताई वहीँ लड़कियों का रुझान गणित में सबसे अधिक फिर अंग्रेजी और साइंस में दिखा। हर लड़की ने अपनी इच्छा इंजीनियरिंग में जाने की जताई जबकि लड़कों में ज्यादातर ने पुलिस और अर्धसैनिक बलों में जाने की इच्छा जताई और तीन लड़कों ने क्रिकेटर बनने में। किसी भी लड़के में उच्च शिक्षा के प्रति आकांक्षा नहीं दिखी।

किताबों से दूर होता समाज

टॉयलेट्स हर घर में हों, इसके लिए दबाव इन्हीं लड़कियों और बहुओं का है। वे नहीं चाहतीं कि वे अपनी माँ या सास की तरह तड़के उठकर खेतों की तरफ भागें, इसीलिए उन्होंने अपने घर के पुरुषों पर दबाव बनाया कि घर पर ही टॉयलेट्स हों। कुछ लोग सरकार के स्वच्छता अभियान के लिए निर्गत की गई राशि चाहते हैं मगर सरकार की लालफीताशाही और प्रधानों के बीच इतने अड़ंगे हैं कि सबको बटते-बटते उस राशि में जरूरतमंद के लिए कुछ बचता ही नहीं। इसलिए लोगों ने खुद के खर्चे पर टॉयलेट्स बनाने शुरू कर दिए हैं। पर सबकी हैसियत नहीं है इस कारण कहीं ये टॉयलेट्स पक्के बने हैं तो कहीं कच्चे। इसके अलावा गाँव में जिस तरह से खेती बट रही है, उसके चलते एक समस्या जमीन की भी है। किसान एक इंच जमीन छोड़ना नहीं चाहता इसलिए पगडंडियां सकरी होते-होते मेड़ जैसी बन गई हैं। किसानों ने तालाबों और ग्रामसभा की जमीन भी धीरे-धीरे कब्ज़े में ले ली है। इस कारण जल संचयन नहीं हो पा रहा है और हर गाँव में पानी का लेबल और नीचे गिरते जा रहा है। नतीजा यह है कि पीने का शुद्ध पानी नहीं मिलता और हर खाते-पीते परिवार को अपने घर में आरओ लगवाना ही पड़ता है। इस गाँव में करीब चार सौ घर हैं लेकिन पोखर नहीं बचे। इस मामले में भी चंचल कुमार ने पहल की है। खेतों के बीच में उन्होंने डेढ़ सौ बाई सौ फिट का दस फीट गहरा पोखर खुदवाया जिसमे पानी वे अपने सब-मर्सिबल से भरते हैं। उनकी देखा-देखी कुछ और किसानों ने भी पोखर खुदवाए हैं।

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इससे एक बात तो यह उभर कर आती है कि गाँव की असल समस्या अब जल, मल और थल की है। जमीन या तो बट रही है अथवा सरकारी परियोजनाओं में जा रही है। ऐसे में किसान के लिए जमीन बचाना एक अहम प्रश्न है। इसी तरह अगर टॉयलेट्स न बनें तो गाँव के गाँव गंदगी के ढेर में बदल जाएंगे। गाँव के भीतर घुसते ही मल की बदबू और इधर-उधर फैली गंदगी के कारण घूमना-फिरना मुश्किल हो जाएगा। तीसरे यदि पोखर और तलब न बचाए गए तो गाँवों का हाल भी वैसा ही हो जाएगा जैसा कि हर छोटे-बड़े शहर का है। प्रदूषण का दबाव बढ़ेगा और इसका खामियाजा न सिर्फ ग्रामवासियों को झेलना पड़ेगा बल्कि जो अनाज हम खाएंगे, वह भी शुद्ध नहीं होगा। प्रदूषण का यह ज़हर हमारे शरीर तक पहुँचेगा। आज खूब फसल लेने के चक्कर में पंजाब के किसान जिस तरह से केमिकल खादें और कीटाणुरोधकों का छिड़काव करते हैं उससे कैंसर समेत तमाम तरह की बीमारियाँ फैली हैं। इसलिए यदि अगर पीढ़ी को बचाना है तो माँयश्चर को बनाए रखना होगा और यह तभी संभव है जब हम जल को बचाएंगे।

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पोखर न सिर्फ जल का संचयन करने में सहायक हैं बल्कि किसान के लिए वे समृद्धि का भी कारण बनते हैं। पोखर मछली पालन में सहायक हैं और उनसे ऑर्गेनिक खाद भी तैयार होती है। साथ ही पोखर गाँव की विविधता को भी बचाते हैं। किसान के लिए ग्रामीण और खेती में उपयोगी पशुओं को पालना भी उपयोगी है बशर्ते चारा भरपूर हो। इसके लिए जरूरी है कि सरकार ने चकबंदी के दौरान हर गाँव में जिन चारागाहों को ग्राम समाज को सौंपा था, उनकी पड़ताल हो क्योंकि उन पर कब्ज़े हो गए हैं।

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