पद्मावत के किंतु-परंतु!

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शंभूनाथ शुक्ल

विवादास्पद फिल्म पद्मावत 25 जनवरी को रिलीज़ तो हो गई, लेकिन उसे देखने जाने वालों की जान-माल की सुरक्षा की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं है। हरियाणा के गुरुग्राम में फिल्म के रिलीज़ किये जाने के आदेश से नाराज कुछ लोगों ने एक नामी स्कूल की बस पर पथराव कर दिया। इससे हरियाणा में थियेटर मालिक इसे चलाने से दर रहे हैं। यही हालात नोएडा, गाज़ियाबाद के हैं। यहाँ के मल्टीप्लेक्स से फिल्म का प्रिव्यू देख कर लौट रहे लोगों पर भी नाराज़ करणी सेना ने गुस्सा उतारा, इसलिए इसके दर्शकों में भी भय है। दिल्ली में भी कुछ गाड़ियों के शीशे तोड़े गए। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से फिल्म दिखाई तो जा रही है, लेकिन किसी भी राज्य की पुलिस ने पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं दी है। गुजरात, गोवा, राजस्थान और मध्यप्रदेश ने तो संजय लीला भंसाली की इस फिल्म को दिखाने से ही मना कर दिया है।

आप की सुप्रीमेसी या सीएम का गच्चा!

पद्मावती विवाद में अब एक नया एंगल तब आ गया है जब आल इंडिया मज़लिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के चीफ असाउद्दीन ओवैसी ने मुसलमानों से अपील की कि वे भी राजपूतों की तरह इसका बायकाट करें। उन्होंने इस फिल्म को बकवास बताया और साथ ही कहा है कि फिल्म में सुल्तान अलाउद्दीन खिलज़ी को ठीक से नहीं दिखाया गया है। हालाँकि सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर फिल्म अब रिलीज़ हो गई है और इसमें कई कट तो कर ही दिए गए हैं, झूमर डांस वाले सीन में रानी पद्मिनी की भूमिका अभिनीत कर रही दीपिका पादुकोणे के कपड़ों को दुरुस्त किया गया है, साथ ही अनावश्यक अंग प्रदर्शन के दृश्य भी ख़त्म कर दिए गए हैं। फिल्म का नाम ‘पद्मावती’ से बदल कर मालिक मोहम्मद जायसी की रचना के आधार पर ‘पद्मावत’ कर दिया गया है। मगर राजपूतों की करणी सेना ने इसे न चलने देने का ऐलान कर रखा है। देश में कई जगह सिनेमाघरों के बाहर प्रदर्शन हुए तथा तोड़-फोड़ की गई है और अभी भी जारी है।

सच लिखने-बोलने पर पाबंदी

यह सब देख कर लगता है कि इतिहास को पढ़ने की चीज़ ही बनाए रखना चाहिए। उसका जब भी फ़िल्मीकरण या दृश्य नाट्य रूपांतरण करेंगे, तब-तब विवाद पैदा ही होंगे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उसके फ़िल्मीकरण की कोशिश जब भी होगी उसमें कुछ न कुछ ऐसा होगा ही जिससे किसी न किसी समुदाय, जातियों अथवा पन्थ विशेष के लोगों की भावनाएं आहत होंगी ही। इसलिए बेहतर तो यही है कि इतिहास को इतिहास ही रहने दिया जाए। ध्यान रखना चाहिए कि अतीत की मान्यताएं, तत्कालीन समाज के सच और उनके मिथक भिन्न थे। इसलिए न तो हम उस समाज का सत्य चित्रण कर सकते हैं और न ही उसके सौन्दर्यबोध को आज समझा जा सकता है। जब हर पीढ़ी अपनी नई पीढ़ी को यह बताती है कि हमारे ज़माने में हम कितने आज्ञाकारी, विनम्र और विचारशील थे कि आज से तुलना नहीं हो सकती तब यह कैसे मान लिया जाए कि जिस ऐतिहासिक कैरेक्टर का वर्णन हम कर रहे हैं वह सही ही होगा!

बहुओं ने खारिज की ‘लोटा’ पार्टी!

आज चित्तौड़ की रानी पद्मिनी पर बनी फिल्म पद्मवती, जिसे अब पद्मावत कर दिया है, पर यही हंगामा मचा हुआ है। यकीनन सुप्रीमकोर्ट ने सही कहा है कि फिल्म को रोकना ठीक नहीं है और उसे रिलीज़ करना ही चाहिए। तथा जो लोग देखने आए हैं, उनकी सुरक्षा की गारंटी पुलिस प्रशासन को लेनी होगी। पर प्रशासन पंगु बना हुआ है और अराजक तत्त्व जो चाह रहे हैं, वही करते हैं। करणी सेना की बात सुनें तो लगता है कि ये सही हैं और अगर इस फिल्म के समर्थकों की बात सुनें तो वह भी सच लगता है। मगर इतिहास की किताबें चित्तौड़ की रानी पद्मिनी के बारे में कुछ भी बताने के प्रश्न पर मौन हैं। अलाउद्दीन खिलज़ी ने चित्तौड़ पर हमला किया और रानी पद्मिनी ने अपनी सखियों समेत राजा के वीरगति पा जाने पर जौहर किया, यह तो पता चलता है, लेकिन पद्मिनी वही पद्मिनी हैं, जिनका वर्णन जायसी ने किया है, इसके ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं हैं। तब फिर झगड़ने की वज़ह क्या है। अब फिल्म देख चुके लोगों का कहना है कि फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे राजपूती आन-बान और शान को ठेस पहुँचती हो। उलटे फिल्म में राजपूतों की वीरता और उनकी आन को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया है। इसके अलावा सुल्तान अलाउद्दीन खिलज़ी के साथ रानी पद्मिनी के कोई दृश्य नहीं हैं और खिलज़ी को कुछ ज्यादा ही ‘खल’ दिखाया गया है। तथा चित्तौड़ के कुलगुरु को विश्वासघाती। मगर विचित्र बात तो यह है कि फिल्म का विरोध राजपूतों की करणी सेना कर रही है।

कोर्ट में जजों की सुनवाई!

अब इतिहास में क्या और कैसा था, यह किसी को ज्ञात नहीं है। खिलज़ी ने चित्तौड़ पर चढ़ाई राज्य लिप्सा के तहत की थी। चित्तौड़ की रानी की सुंदरता सुनकर नहीं। चित्तौड़ के युद्ध में राणा रत्नसेन वीरगति को प्राप्त होते हैं, हालाँकि राजपूताने का इतिहास लिखने वाले कर्नल टॉड ने उन्हें रत्नसेन नहीं भीमसिंह (भीमसी) बताया है, जो चित्तौड़ के राणा लक्ष्मण सिंह के चाचा हैं। चूँकि लक्ष्मण सिंह नाबालिग हैं इसलिए भीमसी उनके संरक्षक हैं। वे मारे गए और उनकी रानी ने जौहर कर लिए। यह ईसवी सन 1302 का वाकया है। इसके दो सौ वर्ष बाद उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में जायस के रहने वाले सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने एक काव्य-रचना की और उसमें अपनी कल्पना की उड़ान भरी। इस पद्मावत नामक काव्य में जायसी ने रानी पद्मिनी, रत्नसेन और सुल्तान अलाउद्दीन खिलज़ी द्वारा उन्हें पाने की ललक की खातिर चित्तौड़ पर हमला किया जाना बताया है। लेकिन काव्य कल्पना होता है और इतिहास एक हकीकत। संजय लीला भंसाली ने दोनों में घालमेल किया और उनके चक्कर में आ गई करणीसेना।

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