कैसा होगा बजट!

Budget

शंभूनाथ शुक्ल

नरेन्द्र मोदी सरकार सोलहवीं लोकसभा का आखिरी बजट पेश करेगी. अगले वर्ष मई तक नई सरकार सत्तारूढ़ हो जाएगी. एक तरह से यह साल चुनावी है, इस तरह साल 2018 के बजट के भी चुनावी होने की संभावना जताई जा रही हैं. लेकिन एक सवाल और खड़ा होता है कि तब मोदी सरकार के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का क्या होगा! पिछले चार वर्षों से मोदी सरकार का ज्यादातर जोर आर्थिक सुधारों और लोक-लुभावन नीतियों से बचने का रहा है. मोदी सरकार अतीत की कांग्रेसी सरकारों को कोसती रही है क्योंकि कांग्रेस की सरकारों ने संरक्षणवाद को बढ़ावा दिया था. अब अगर फिर-से सरकार पहले की तरह ही जनता को ललचाने के लिए लोक लुभावन बजट लाएगी तो आर्थिक सुधार फिर पटरी से उतरेंगे. इसलिए लाख टके का सवाल यह है कि मोदी सरकार आखिर क्या करेगी!

पद्मावत के किंतु-परंतु!

सरकार यदि आर्थिक सुधार की नीतियों पर अड़ी रहती है तो न सिर्फ आम लोग सरकार से दूर जाएंगे बल्कि जीएसटी और नोटबंदी से परेशान व्यापारी भी भड़केंगे. हर एक के समक्ष यही सवाल है कि आगे क्या होगा. इसमें कोई शक नहीं कि आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के चलते आम जनता तो बेहाल हुई है, जीपीडी भी गिरी है. इससे साफ़ लगता है कि आर्थिक सुधार के लिए चलाए गए कार्यक्रमों का अपेक्षित असर नहीं पड़ा है. किसी भी क्षेत्र में प्रगति नहीं दीखती है न सरकार के अधिकारियों की चाल-ढाल में न सरकार के अपने कार्यक्रमों में. फिलहाल तो चारों तरफ अफरा-तफरी की ही हालत है. नोटबंदी से भले एक तबके को परपीड़न का अहसास हुआ हो लेकिन व्यापार तो गिरा ही और बैंक अधिकारियों ने इसका खूब फायदा उठाया. इसी तरह जीएसटी से लोग परेशान हुए. आज तक किसी को यह नहीं पता चला कि वास्तविक स्थिति क्या है. लेन-देन को आनलाइन करा देने से हर व्यक्ति परेशान है. देश में इन्टरनेट की जैसी व्यवस्था है, उससे यह आसान नहीं लगता कि नेट के जरिये लेन-देन आसान हो पायेगा.

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एक बात और है कि भारत एक बड़ा देश है और अभी इंटरनेट सेवाओं की यहाँ इतनी पहुँच नहीं है कि सब जगह यह सुगमतापूर्वक काम कर सके. खुद सरकारी सेवाओं तक में अभी नेट ठप रहता है तो यह कैसे मान लिया जाए कि यह आम लोगों की पहुँच में होगा. सच तो यह है कि बैंकिंग सेवाएँ ध्वस्त हैं. रेलवे जैसी सेवाओं में आम लोगों से तो भरपूर किराया वसूला जा रहा है लेकिन सुविधाएं सिफर. तब सवाल उठता है कि सरकार ने किराए क्यों बढ़ाए. किसानों को उनकी उपज का स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप भुगतान नहीं हुआ. जबकि भाजपा ने 2014 में उन्हें यह भरोसा दिया था कि उन्हें इन सिफारिशों के अनुरूप ही भुगतान होगा. औद्योगिक मजदूरों का छंटनी के कारण बुरा हाल है. कर तो खूब वसूले जा रहे हैं, लेकिन करदाता को सुविधा कोई नहीं. नतीजा किसान आत्महत्या कर रहे हैं. उनके कर्ज़ भी नहीं माफ़ किये गए. ऐसे में कैसे मान लिया जाए कि सरकार के आर्थिक सुधार कार्यक्रम सफल रहे. लेकिन सरकार के समक्ष यक्ष प्रश्न यह है कि वह इनसे पीछे कैसे हटे.

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किंतु यह भी जटिल है कि सरकार लोक-लुभावन बजट लाए. अभी तक तो सरकार ने अपने कदमों से ऐसा कभी नहीं प्रकट किया है कि मतदाताओं को लुभाने वाली नीतियां लाएगी. सरकार को ऐसा करने के लिए अपनी सारी नीतियां पलटनी होंगी. एक तरह से माना जाए तो मोदी सरकार की छवि एक कड़क सरकार की है, जिसके यहाँ लुभाने के लिए कुछ नहीं है. अर्थात एक तरह से इस सरकार ने किसी भी तरह के संरक्षण देने की सरकारी नीतियों से अपनी इतनी दूरी बना ली है कि लोग उस पर भरोसा नहीं करेंगे. इसके लिए एक उदाहरण काफी होगा. जब सरकार ने 500 और हज़ार के नोट 2016 में अचानक बंद किये तो पहले तो किसी को भरोसा नहीं हुआ और जब भरोसा हुआ तो नए-नए बाज़ार में आए दो हज़ार के नोटों को लेकर आज भी आम लोग सशंकित रहते हैं. इसलिए यह अब इतना आसान नहीं होगा कि लोगबाग सरकार की उदार नीतियों पर भरोसा कर लें.

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इसलिए अभी कुछ भी कहना आसान नहीं है, लेकिन चूँकि यह एक सामान्य परम्परा चली आ रही है कि सरकारें चुनावी साल में लोक-लुभावन बजट लाती ही हैं, इसीलिए यह माना जा रहा है कि सरकार उदार बजट लाएगी. मगर उदारता किस तरह की होगी, यह एक बड़ा सवाल है. क्या कुछ और वस्तुओं पर से जीएसटी हटाई जाएगी या फिर बैंकिंग की जटिलताओं को सहज किया जाएगा अथवा रेल किरायों और महंगाई से राहत मिलेगी. किन्तु फिर सवाल आएगा कि आम लोगों तक सरकार कैसे अपनी बात पहुंचाएगी. जब तक ये बातें पहुंचेंगी चुनाव सर पर होंगे. इसमें कोई शक नहीं कि मोदी सरकार को यदि दुबारा आना है तो कुछ चीज़ों में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही होगा. अब सरकार कैसे यह परिवर्तन कर पाएगी, इसे देखना होगा.

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